दिनांक-25.08.2026 को संस्कृत-विभाग द्वारा ‘संस्कारशाला’ तथा ‘संस्कृत-विभाग-छात्रपरिषद्’ के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘संस्कृत-सप्ताह’ के अन्तर्गत ‘आर्ष-काव्यों में उपनिबद्ध भारतीय ज्ञान-परम्परा के सूत्र’ विषय पर एकल-व्याख्यान का आयोजन किया गया।
Published: August 25, 2026
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कार्यक्रम का आरम्भ मुख्य- वक्ता डाॅ.विजयलक्ष्मी त्रिवेदी जी और काॅलेज की प्राचार्या प्रो.नीरू टण्डन जी द्वारा वाग्देवता सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप-प्रज्ज्वालन से हुआ।
प्राचार्या जी ने अपना स्वागत-वक्तव्य देते हुए कहा कि आज भारतीय संस्कृति के संवर्धन के लिए संस्कृत-भाषा का अध्ययन अति-आवश्यक है। उन्होंने कहा कि महर्षि पाणिनि द्वारा बताए गए 14 माहेश्वर-सूत्रों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ध्वनियाँ समाहित हैं। 'शब्द' नित्य हैं,अतः इनका प्रयोग अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
ए.एन.डी.काॅलेज,कानपुर की सेवानिवृत्त प्राचार्या तथा संस्कृत-विभागाध्यक्ष एवं वी.एस.एस.डी.काॅलेज के संस्कृत-विभाग के एम.ए.1966 बैच की प्रतिभाशालिनी पूर्व छात्रा डाॅ. विजयलक्ष्मी त्रिवेदी जी ने मुख्य-वक्ता के रूप में उद्बोधन देते हुए कहा कि रामायण का क्रौंच-क्रौंची प्रसंग यह प्रेरणा देता है कि दु:खियों के प्रति सदैव 'महाकरुणा' की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने 'कठोपनिषद्' में वर्णित ऋषि उद्दालक और नचिकेता के संवाद को प्रस्तुत करते हुए कहा कि दान सदैव उदारता तथा सद्भावनापूर्वक देना चाहिए। डाॅ. त्रिवेदी ने विद्यार्थियों को अनासक्त होकर शुद्ध-कर्म करने की प्रेरणा दी।
विभागाध्यक्ष प्रो.अनीता सोनकर ने अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि पंचकोश;अर्थात् अन्नमय,प्राणमय,मनोमय,विज्ञानमय और आनन्दमकोश के ज्ञान के द्वारा प्राप्त एकाग्रता से समस्त भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त किया जा सकता है।
धन्यवाद ज्ञापन छात्र-परिषद् के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र त्रिवेदी ने किया। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थिनी सुश्री देवांशिका द्विवेदी ने किया और संयोजन प्रो.शोभा मिश्रा तथा सह-संयोजन प्रो.ओम् प्रकाश मिश्र ने किया।
कार्यक्रम में प्रो.आनन्द शुक्ल, प्रो.पी.एस.डोभाल, प्रो.नन्दलाल सहित विभाग के शोधार्थी तथा स्नातक-स्नातकोत्तर कक्षा के विद्यार्थी उपस्थित रहे।